कैसे मुगल बादशाह अंग्रेजों की पेंशन पर पलने वाले आम इंसान बन गए? अपने ही लालकिले में बन गए कैदी

मुगल बादशाह जहांगीर की इनायत से ईस्ट इंडिया कंपनी को 1615 में भारत में व्यापार करने की इजाजत हासिल हुई थी. 188 साल बाद 1803 में जहांगीर के वंशज मुगल बादशाह शाह आलम इसी कम्पनी के पेंशनर और ब्रिटिश साम्राज्य की प्रजा बन गए. 55 साल के अंतराल पर 1858 में आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर अपने ही लालकिले में ब्रिटिश फौजी अदालत के सामने एक कैदी के तौर पर पेश थे. अदालत ने उन्हें ताउम्र देश निकाला की कैद की सुनाई थी. बूढ़े बादशाह की उम्र का बाकी समय रंगून में कैद की जिल्लत में गुजरा था.

इसी मुकदमे की जिरह के दौरान अंग्रेज अफसर सैंडर्स ने बताया था कि इंगलैंड से व्यापार करने आई ईस्ट कंपनी कैसे भारत की मालिक और मुगल बादशाह कैसे उसके पेंशनर और ब्रिटिश ताज की प्रजा बन गए?

हर मौके किया जलील

27 जनवरी 1858 की दोपहर लाल किले के दीवाने खास में कैदी बहादुर शाह जफर फौजी अदालत के सामने पेश किए गए. जफर अभी बहुत बीमार थे. जाड़े का वो दिन बहुत ठंडा, नम था. वे चलने की हालत में नहीं थे. उन्हें पालकी से लाया गया. दो लोगों की मदद से उतारा गया. यह अहसास कराने के लिए कि वे अब ‘ कंपनी की प्रजा हैं, मोर्छल और हुक्के की इजाजत नहीं दी गई.

जूनियर रैंक के पांच जजों की फौजी अदालत की अगुवाई कर्नल डॉज कर रहे थे. सरकारी वकील मेजर हैरियट और बचाव के वकील गुलाम अब्बास थे. इसमें अब्बास को छोड़कर जजों और अंग्रेज वकील को वो हिन्दुस्तानी जुबान या उर्दू नहीं आती थी जिसमें मुकदमें की कार्यवाही का कुछ हिस्सा पूरा होना था. खासतौर पर जफ़र की दस्तखत या मुहर के कागजात या फिर गवाह जो सबूत के तौर पर उनके खिलाफ पेश किए जाने थे उनकी भाषा से भी ये जज अनजान थे. इन सबके अनुवाद के नाम पर भी सिर्फ खाना पूरी थी.

मराठों के बंधक

इस मुकदमे के दौरान 12 फरवरी 1858 को अदालत के सामने दिल्ली के प्रभारी कमिश्नर और लेफ्टिनेंट गवर्नर के एजेंट सी.बी.सैंडर्स बतौर गवाह पेश हुए. जिरह के दौरान अदालत ने उनसे सवाल किया कि कैसे मुगल बादशाह ब्रिटिश सरकार की प्रजा और पेंशनभोगी बन गए? सैंडर्स का जवाब था, ,”रोहिल्ला सरदार गुलाम कादिर ने दिल्ली के शासक बादशाह शाह आलम की आंखें फोड़ दीं और उनका हर तरीके से अपमान किया. इसके बाद शाह आलम मराठों के अधीन हो गए. हालांकि उस समय दिल्ली पर उनका कुछ अधिकार था लेकिन 1803 तक कमोवेश वे मराठों के बंधक ही रहे.

अंग्रेजों की शरण में

अलीगढ़ पर कब्जे के बाद 1803 में जनरल लेक ने ब्रिटिश सेना के साथ दिल्ली पर धावा बोला. पटपड़गंज में मराठे बुरी तरह पराजित हुए. इसके बाद दिल्ली और किला छोड़ कर वे पलायन कर गए. उनके दिल्ली छोड़ते ही शाह आलम ने जनरल लेक को एक संदेश भेजकर ब्रिटिश संरक्षण की अपील की. ब्रिटिश सेनाओं ने 14 सितंबर 1803 को दिल्ली में प्रवेश किया और यह तारीख इस लिए यादगार बन गई क्योंकि उसी दिन से दिल्ली के एक वक्त के बादशाह ब्रिटिश सरकार के पेंशनभोगी, याचक और प्रजा बन गए.

लालकिले की सीमा में बादशाहत

सैंडर्स ने एक अन्य सवाल के जवाब में अदालत को बताया था कि ब्रिटिश संरक्षण की बदौलत मुगल बादशाह को मराठों के बड़े कष्ट से छुटकारा प्राप्त हुआ और वे उदार नियंत्रण की स्थिति में आ गए. ब्रिटिश अधीन उन्हें नाममात्र की ही संप्रभुता प्राप्त थी और उनका महल की सीमा के बाहर कोई अधिकार नहीं था. वो केवल अपने कर्मचारियों को उपाधियां दे सकते थे लेकिन अन्य किसी के लिए वे इसके लिए अधिकृत नहीं थे. बादशाह और उनके प्रत्यक्ष वारिस कंपनी की स्थानीय अदालतों के अधिकार क्षेत्र थे लेकिन ब्रिटेन की सर्वोच्च सरकार के अधीन

थे.

1803 में ही खत्म हो गई मुगल सल्तनत

सैंडर्स ने बताया था कि कमानी बहादुर शाह जफ़र को एक लाख रुपया महीना पेंशन देती है, जिसमें निन्यान्नवे हजार दिल्ली में और एक हजार रुपया उनके लखनऊ में रह रहे परिवार को दिया जाता है. दिल्ली के पड़ोस में शाही भूमि से सालाना डेढ़ लाख और दिल्ली की अनेक कोठियों और मकानों के किराए से भी उन्हें अच्छी आमदनी प्राप्त होती है.

अदालत ने जानना चाहा था कि क्या बादशाह को हथियारबंद सिपाही रखने की भी इजाजत थी? सैंडर्स के मुताबिक बहादुर शाह जफर ने गवर्नर जनरल ऑकलैंड से इसकी इजाजत मांगी थी और उन्हें इस बात की अनुमति दे दी गई थी कि अपनी स्वीकृत आमदनी से जितने सिपाहियों का वेतन भुगतान कर सकें, उतने सिपाही रख सकते हैं.

सैंडर्स की गवाही ने साफ किया कि भले बहादुर शाह जफ़र को आखिरी बादशाह माना जाए, असलियत में तो 1803 में ही मुगल सल्तनत खत्म हो चुकी थी और सच्चे अर्थों में बादशाह “प्रजा” बन चुका था.

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